पवित्रशास्त्र को कंठस्थ क्यों करें?

1. पाप से बचने के लिए।

“मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है,
कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।”
भजन संहिता 119:11

2. आज्ञा मानने के लिए।

“हे मेरे पुत्र, मेरी बातों को माना कर, और मेरी आज्ञाओं को अपने मन में रख छोड़।
मेरी आज्ञाओं को मान, इससे तू जीवित रहेगा,
और मेरी शिक्षा को अपनी आँख की पुतली जान;
उनको अपनी उँगलियों में बाँध,
और अपने हृदय की पटिया पर लिख ले।”
नीतिवचन 7:1-3

3. शैतान का सामना करने के लिए

मत्ती 4 में शैतान ने यीशु की तीन बार परीक्षा की, और हर बार उसने पवित्रशास्त्र से उत्तर दिया और कहा “लिखा है…”। अन्त में (पद 11) शैतान उसके पास से चला गया। हम भी ऐसा कर सकते हैं, यदि हम कंठस्थ करके उसके वचनों को अपने हृदय में रख छोड़ें। यूहन्ना 14:26 कहता है: “परन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैंने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।”

तब उस समय पवित्र आत्मा यीशु को एकांत में ले गया ताकि शैतान से उसकी परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखनेवाले ने पास आकर उससे कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।” यीशु ने उत्तर दिया, “लिखा है, ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा।’ ” तब शैतान उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया। और उससे कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आपको नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है, ‘वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।’ ” यीशु ने उससे कहा, “यह भी लिखा है, ‘तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।’ ” फिर शैतान उसे एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, “यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।” तब यीशु ने उससे कहा, “हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है: ‘तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।’ ” तब शैतान उसके पास से चला गया, और स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।
मत्ती 4:1-11

4. अपने बच्चों को सिखाने के लिए।

“और ये आज्ञाएँ
जो मैं आज तुझको सुनाता हूँ
वे तेरे मन में बनी रहें
और तू इन्हें अपने बाल-बच्चों को समझाकर सिखाया करना,
और घर में बैठे,
मार्ग पर चलते,
लेटते,
उठते, इनकी चर्चा किया करना।”
व्यवस्थाविवरण 6:6-7

5. सुसमाचार सुनाने के लिए तैयार रहने के लिए

“पर मसीह को प्रभु जानकर अपने-अपने मन में पवित्र समझो,
और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे,
तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो,
पर नम्रता और भय के साथ;”
1 पतरस 3:15

हमें परमेश्वर के सारे हथियार बाँधने की आज्ञा दी गई है, जिसमें पाँवों में सुसमाचार सुनाने की तैयारी के जूते पहनना भी सम्मिलित है। इफिसियों 6:15 कहता है “और पाँवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहनकर;” कंठस्थ करना सुसमाचार सुनाने के लिए तैयार रहने का एक तरीका है।

नीतिवचन 22:20-21 कहता है “मैं बहुत दिनों से तेरे हित के उपदेश और ज्ञान की बातें लिखता आया हूँ, कि मैं तुझे सत्य वचनों का निश्चय करा दूँ, जिससे जो तुझे काम में लगाएँ, उनको सच्चा उत्तर दे सके।”

6. अपनी ही इच्छा पर जय पाने के लिए

यदि मैं कहूँ, “मैं उसकी चर्चा न करूँगा
न उसके नाम से बोलूँगा,”
तो मेरे हृदय की ऐसी दशा होगी मानो मेरी हड्डियों में धधकती हुई आग हो,
और मैं अपने को रोकते-रोकते थक गया
पर मुझसे रहा नहीं जाता।
यिर्मयाह 20:9

यिर्मयाह के जीवन के इस समय में यहोवा का वचन दिन भर उसके लिये “निन्दा और ठट्ठा” का कारण बन गया था। इसलिए यिर्मयाह का मन बिगड़ गया और उसने ठान लिया कि वह अब परमेश्वर के लिए नहीं बोलेगा। परन्तु परमेश्वर का वचन उसके भीतर आग की तरह जलता रहा, और वह चुप न रह सका।


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