यह पत्र एक भाई के इस प्रश्न के उत्तर में लिखा गया था: “क्या तुम सचमुच सोचते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारी संगति प्रतिदिन होनी चाहिए?” – इसके विपरीत कि केवल सप्ताह में एक बार कलीसिया जाया जाए और कभी-कभी पवित्रशास्त्र पढ़ लिया जाए।


परमेश्वर के साथ प्रतिदिन की संगति

प्रिय भाई,

उस दिन तुम्हारे प्रश्न ने मुझे सचमुच लाभ पहुँचाया। वर्षों से मैं प्रतिदिन प्रभु के साथ गहरी संगति खोजता रहा हूँ, इस लालसा के साथ कि उसकी आवाज़ सुनूँ, ताकि उसकी आज्ञा मानूँ और इस प्रकार उससे अपना प्रेम प्रगट करूँ। मैंने ऐसा प्रतिदिन करने की प्रेरणा महसूस की है। परन्तु जब तुमने उस दिन यह प्रश्न पूछा, तो मुझे मन ही मन अपने आप से पूछना पड़ा – “मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ?” तब से मैं यह जाँचता रहा हूँ कि मैं जैसा सोचता हूँ, वैसा क्यों सोचता हूँ। क्या इसलिए कि मैंने अपनी जवानी में किसी को ऐसा सिखाते सुना था? क्या मैंने इसे कहीं पढ़ा था? क्या ये विचार मैंने स्वयं गढ़ लिए? या – क्या यह स्वयं परमेश्वर की ओर से आया, जो मुझसे, अपने पुत्र से, बात कर रहा था, जब मैंने बीते समय में उसके वचन पर मनन किया था, और उसने मुझ पर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की, कि वह “…लेकर तुम्हें बताएगा” यूहन्ना 16:14 और मुझे “…बुद्धि की आत्मा और अपने ज्ञान का प्रकाश…” इफिसियों 1:17 दिया? इस समय मैं विश्वास करता हूँ कि बात दूसरी ही है!

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, “क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर के साथ संगति प्रतिदिन होनी चाहिए?”, मैं नीचे दिए गए वचन, उनके विषय में कुछ विचारों के साथ, प्रस्तुत करना चाहता हूँ। ये वे विचार हैं जो तुम्हारे प्रश्न पर विचार करते समय बार-बार मेरे मन में आते रहे।

“क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता,
वरन् मेरी डेवढ़ी पर प्रतिदिन खड़ा रहता,
और मेरे द्वारों के खम्भों के पास दृष्टि लगाए रहता है।
क्योंकि जो मुझे पाता है, वह जीवन को पाता है,
और यहोवा उससे प्रसन्न होता है।”
नीतिवचन 8:34-35

इस वचन के अनुसार सच्ची बुद्धि को सुनने और जीवन पाने का मार्ग है प्रतिदिन खड़े रहना और दृष्टि लगाए रहना। सच्ची बुद्धि केवल सही व्याख्या के द्वारा मनुष्य की समझ से नहीं, बल्कि प्रकाशन के द्वारा प्राप्त होती है! परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह मसीह की बातें लेकर हमें “…बताएगा” यूहन्ना 16:14, और इसे कहा गया है “…बुद्धि की आत्मा और अपने ज्ञान का प्रकाश… और तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों…” इफिसियों 1:17-18।

“एक वर मैंने यहोवा से माँगा है,
उसी के यत्न में लगा रहूँगा;
कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊँ,
जिससे यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूँ,
और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूँ।”
भजन संहिता 27:4

उन सब बातों में से, जिनकी मनुष्य और राजा इच्छा कर सकते थे, दाऊद ने कहा कि उसने एक बात की इच्छा की! वह अपने जीवन के हर एक दिन यहोवा की उपस्थिति में रहना चाहता था। वह यहोवा की मनोहरता को निहारना चाहता था, और वह परमेश्वर से बातें पूछना चाहता था।

“…इसी में दिन-रात ध्यान दिए रहना…”
यहोशू 1:8
“…वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात-दिन ध्यान करता रहता है…”
भजन संहिता 1:2

“…दिन-रात…” शब्द मुझे किसी ऐसे काम की ओर संकेत करते नहीं लगते जो कभी-कभार किया जाए, जब मेरे पास समय हो या मुझे सुविधा हो, बल्कि ऐसे काम की ओर जो “हर समय” किया जाए, हर दिन, हर रात, मेरे जीवन के सब दिनों में।

“जैसे हिरनी नदी के जल के लिये हाँफती है,
वैसे ही, हे परमेश्वर, मैं तेरे लिये हाँफता हूँ।
जीविते परमेश्वर, हाँ परमेश्वर,
का मैं प्यासा हूँ,
मैं कब जाकर परमेश्वर को अपना मुँह दिखाऊँगा?
मेरे आँसू दिन और रात मेरा आहार हुए हैं;
और लोग दिन भर मुझसे कहते रहते हैं,
तेरा परमेश्वर कहाँ है?”
भजन संहिता 42:1-3

जल की प्यास, जिसे परमेश्वर ने प्राण की इस प्यास के चित्र के रूप में हम में रखा है, प्रतिदिन लगती है! हर दिन जब मैं जागता हूँ, मुझे प्यास लगती है। क्या यह उस प्राण की प्यास का चित्र नहीं, जो हमें हर दिन होनी चाहिए?

“हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढ़ूगा;
सूखी और निर्जल ऊसर भूमि पर, मेरा मन तेरा प्यासा है…”
भजन संहिता 63:1
“…सूखी भूमि के समान मैं तेरा प्यासा हूँ… मुझसे अपना मुँह न छिपा… प्रातःकाल को अपनी करुणा की बात मुझे सुना…”
भजन संहिता 143:6-8

ये कुछ वचन हैं जो तुम्हारे प्रश्न पर विचार करते समय प्रभु ने मेरे मन में डाले। जब मैं इन पर विचार करता हूँ, तो मैं व्यक्तिगत रूप से प्रेरित होता हूँ कि अपने परमेश्वर को प्रतिदिन, भोर को, और रात में भी खोजूँ।

भाई, जब मैंने फिर से परखा कि मैं जैसा सोचता हूँ, वैसा क्यों सोचता हूँ, तो मुझे निश्चय हो गया है कि मेरा प्रभु सचमुच चाहता है कि मैं उसकी उपस्थिति खोजूँ – उसकी मनोहरता को निहारने और उससे बुद्धि और मार्गदर्शन माँगने के लिए … प्रतिदिन।

मुझे चमकाने के लिए धन्यवाद (नीतिवचन 27:17)।

एक संगी दास


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